प्रस्तावना: जगत के नाथ श्री जगन्नाथ श्री जगन्नाथ मंदिर, पुरी, सनातन धर्म के चार प्रमुख धामों में से एक । यह ओडिशा राज्य के तटवर्ती शहर पुरी में स्थित है। जगन्नाथ शब्द का अर्थ 'जगत के स्वामी' है । यह मंदिर भगवान विष्णु के स्वरूप जगन्नाथ को समर्पित है, जिन्हें स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का ही एक रूप माना जाता है । अपनी स्थापना के समय से ही यह मंदिर आस्था, भक्ति और रहस्यों का केंद्र रहा है। इस अद्भुत दिव्य धाम में प्रतिदिन हजारों की संख्या में भक्त दर्शन के लिए आते हैं। यह मंदिर न केवल अपनी भव्यता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इससे जुड़े अनगिनत चमत्कार और रहस्य इसे और भी अद्वितीय बनाते हैं। 🕉️ पौराणिक कथा: मूर्तियों के अधूरे होने का रहस्य मंदिर की मूर्तियों के अधूरे होने के पीछे एक बहुत ही रोचक पौराणिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि राजा इंद्रद्युम्न को एक रात्रि में स्वप्न आया कि समुद्र के तट पर एक दिव्य दारु ब्रह्म (विशेष लकड़ी) जो आकर गिरेगी, उससे भगवान की मूर्ति बनाई जाए। राजा को भगवान विष्णु ने आदेश दिया कि 'दारु ब्रह्म' को खोजकर उससे अपने प्रिय स्वामी की मूर्ति का निर्माण ...
संकट निवृत्ति के लिए:
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणतक्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः।
लक्ष्मी प्राप्ति के लिये:
तत् आरम्भ नन्दस्य बृज: सर्वसमृध्दिमान।
हरेनि्वासात्मगुणे: रमार्कीडामभुत्रृप।।
वर प्राप्ति के लिये:
कल्यायनि. महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नंदगोपसचतं देवी पतिं मे कुरु मे नमः।
विध्या प्राप्ति के लिये:
मां शारदे नमस्तुभ्य काश्मीरपुरवासिनी।
चामहं प्रार्थये नित्यं विद्या दान्ण्च देसी में।।
सर्वत्र विजय प्राप्ति के लिये:
विजयाभीमुखा राजा श्रत्वैतदभियाति यान्।।
बर्लि तस्मै हरन्त्यर्गे राजान: पृथवे राधा।
भगवतप्राप्ति के लिये:
हानाथ रमण र्पेष्ठ क्वासि -क्वासि महाभुज।
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणतक्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः।
लक्ष्मी प्राप्ति के लिये:
तत् आरम्भ नन्दस्य बृज: सर्वसमृध्दिमान।
हरेनि्वासात्मगुणे: रमार्कीडामभुत्रृप।।
वर प्राप्ति के लिये:
कल्यायनि. महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नंदगोपसचतं देवी पतिं मे कुरु मे नमः।
विध्या प्राप्ति के लिये:
मां शारदे नमस्तुभ्य काश्मीरपुरवासिनी।
चामहं प्रार्थये नित्यं विद्या दान्ण्च देसी में।।
सर्वत्र विजय प्राप्ति के लिये:
विजयाभीमुखा राजा श्रत्वैतदभियाति यान्।।
बर्लि तस्मै हरन्त्यर्गे राजान: पृथवे राधा।
भगवतप्राप्ति के लिये:
हानाथ रमण र्पेष्ठ क्वासि -क्वासि महाभुज।
दास्यास्ते कृपणता में सके दर्शय सात्रिधिम्।।
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