🙏 नवरात्रि का षष्ठम दिवस: माँ कात्यायनी की कथा, पूजन विधि और महत्वपूर्ण बातें
नवरात्रि के छठे दिन की पूजा माँ दुर्गा के छठे स्वरूप माँ कात्यायनी को समर्पित है। यह दिन षष्ठी तिथि को पड़ता है। माँ कात्यायनी अत्यंत तेजस्वी, वीरता प्रदान करने वाली एवं साधकों को मनोवांछित फल देने वाली देवी हैं। इनकी उपासना से संतान प्राप्ति, वैवाहिक जीवन में सुख, शत्रुओं पर विजय और आध्यात्मिक उन्नति होती है। शास्त्रों में इन्हें ‘महिषासुरमर्दिनी’ का एक रूप भी बताया गया है।
चैत्र नवरात्रि 2026 में षष्ठी तिथि 24 मार्च (मंगलवार) को है। इस दिन विशेष रूप से कन्याओं का पूजन, कात्यायनी मंत्र का जाप और व्रत रखने का विधान है। मान्यता है कि माँ कात्यायनी की कृपा से साधक के जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।
पुराणों के अनुसार, प्राचीन काल में कात्य नामक महान ऋषि थे। उन्होंने भगवती आदिशक्ति की अत्यंत कठोर तपस्या की। उनकी इच्छा थी कि माँ उनकी पुत्री के रूप में जन्म लें। तपस्या से प्रसन्न होकर माँ ने उन्हें दर्शन दिए और वरदान दिया कि वे कात्य ऋषि की पुत्री के रूप में जन्म लेंगी। तदनुसार माँ ने कात्य ऋषि के यहाँ पुत्री रूप में जन्म लिया। इसलिए इनका नाम ‘कात्यायनी’ पड़ा।
इस अवतार का मुख्य उद्देश्य था – महिषासुर नामक दैत्य का संहार। महिषासुर ने तपस्या कर ब्रह्मा से वरदान प्राप्त कर लिया था कि किसी भी पुरुष, देवता या असुर द्वारा उसका वध नहीं होगा। वह अत्याचारी बन गया और स्वर्ग-पृथ्वी पर आतंक मचा दिया। सभी देवता परेशान होकर ब्रह्मा, विष्णु, महेश के पास गए। तब तीनों देवों के तेज से एक दिव्य प्रकाश उत्पन्न हुआ और उससे देवी कात्यायनी प्रकट हुईं। सभी देवताओं ने अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र देवी को प्रदान किए।
माँ कात्यायनी ने सिंह पर सवार होकर महिषासुर से युद्ध किया। नौ दिनों तक घोर संग्राम चला। अंततः दसवें दिन (विजयादशमी) को माँ ने महिषासुर का वध कर दिया। इस प्रकार कात्यायनी ने धर्म की रक्षा और अधर्म का नाश किया। यह कथा हमें सिखाती है कि जब भी अत्याचार चरम पर होता है, तब शक्ति स्वयं अवतरित होकर संतुलन स्थापित करती है।
पूजा विधि: प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल पर माँ कात्यायनी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। सिंहासन पर लाल या गुलाबी वस्त्र बिछाएँ। देवी को लाल पुष्प, गुलाब, शहद, मधु, शृंगार की वस्तुएँ, नैवेद्य अर्पित करें। षष्ठी तिथि पर विशेष रूप से हलवा-पूरी-चना का भोग लगाया जाता है।
व्रत नियम: यदि आप नवरात्रि का निर्जला या फलाहार व्रत कर रहे हैं, तो छठे दिन भी उसी नियम का पालन करें। व्रत में सात्विक भोजन (कुट्टू आटा, सिंघाड़ा आटा, फल, दूध, साबूदाना) ग्रहण कर सकते हैं। अन्न, नमक, लहसुन-प्याज का त्याग करें। दिन में एक बार भोजन करें। संध्या में पुनः पूजा करें और आरती उतारें।
बीज मंत्र:
ध्यान मंत्र:
वन्दे वाञ्छित मनोरथार्थ चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहारूढा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्विनीम्॥
स्वर्णाभां वराभयकरां त्रिनेत्रां श्वेताम्बरधराम्।
नानालङ्कार भूषितां भक्तानामिष्टदायिनीम्॥
कात्यायनी स्तोत्र (संक्षिप्त):
कात्यायन्यै च विद्महे कन्याकुमार्यै च धीमहि।
तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्॥
आरती: जय कात्यायनी माता, जय कात्यायनी माता।
तुम भक्तन की रक्षक, दुष्टन की घाता॥
- विवाह में बाधा निवारण: कन्याएं माँ कात्यायनी की पूजा विधि-विधान से करें। षष्ठी तिथि पर शहद का भोग लगाकर 11 कन्याओं को भोजन कराएं। शीघ्र विवाह योग बनता है।
- शत्रु नाश: यदि कार्यक्षेत्र में प्रतिस्पर्धा या शत्रु परेशान कर रहे हों, तो माँ कात्यायनी की सिंहासन पर स्थित प्रतिमा के सामने लाल चुनरी चढ़ाकर ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे’ मंत्र का 108 बार जाप करें।
- आरोग्य लाभ: जिन्हें दीर्घकालीन रोग हो, वे षष्ठी को देवी को शहद अर्पित करें और फिर उस शहद का सेवन करें। रोग शांत होते हैं।
- पारिवारिक सुख: नियमित रूप से नवरात्रि के छठे दिन माँ कात्यायनी की कथा सुनने और पूजन करने से परिवार में वात्सल्य, समृद्धि और सुख-शांति बढ़ती है।
- वाहन सुख: माँ सिंहासन पर विराजमान हैं, इसलिए यदि वाहन से संबंधित कोई समस्या हो तो देवी को लाल फूल चढ़ाकर प्रार्थना करें।
प्राचीन काल में एक राजा थे – सुव्रत। उनकी कोई संतान नहीं थी। राजा ने माँ कात्यायनी की आराधना की। राजा ने षष्ठी तिथि को व्रत रखा और पूरे मन से देवी की पूजा की। माँ प्रसन्न हुईं और राजा को दर्शन देकर वरदान दिया कि उनके यहाँ एक पराक्रमी पुत्र होगा। राजा को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। तब से षष्ठी व्रत संतान प्राप्ति, मनोकामना सिद्धि के लिए प्रसिद्ध हो गया।
पारण (व्रत खोलने की विधि): षष्ठी का व्रत सप्तमी तिथि को पारण किया जाता है। यदि आपने छठे दिन व्रत रखा है तो अगले दिन सूर्योदय के बाद पूजा कर फलाहार ग्रहण करें। यदि नवरात्रि के सभी नौ दिन व्रत है तो नवमी या दशमी को पारण करें।
- बिहार/झारखंड: यहाँ षष्ठी को ‘दुर्गा षष्ठी’ कहा जाता है। बड़े पंडालों में विशेष आरती होती है। कन्याओं को ‘ज्वरा’ भोजन कराया जाता है।
- गुजरात: गरबा और डांडिया रास का विशेष आयोजन होता है। माँ कात्यायनी की आराधना के साथ नृत्य-संगीत होता है।
- दक्षिण भारत: ‘बोम्मई गोलु’ (गोलु) के दौरान छठे दिन देवी को विशेष शृंगार अर्पित किया जाता है।
- महाराष्ट्र: षष्ठी को ‘महाराष्ट्र शाकंभरी’ के रूप में भी जाना जाता है। महिलाएं सोलह शृंगार कर देवी की पूजा करती हैं।
नवरात्रि का षष्ठम दिवस अत्यंत शक्तिशाली है। माँ कात्यायनी की उपासना से साधक में आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है। यह दिन विशेषकर कन्याओं, युवतियों और उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो किसी भी प्रकार के संघर्ष से जूझ रहे हैं। सच्चे मन से पूजन, व्रत और कथा श्रवण करने से माँ कात्यायनी अवश्य प्रसन्न होती हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करती हैं।
इस नवरात्रि में षष्ठी तिथि (24 मार्च 2026) को माँ कात्यायनी का ध्यान करें, उनकी कथा सुनें और अपने जीवन में सुख-समृद्धि का आह्वान करें।
नोट: उपरोक्त जानकारी धार्मिक ग्रंथों, पुराणों एवं ज्योतिषीय परंपरा पर आधारित है। नवरात्रि व्रत एवं पूजन हेतु किसी योग्य पुरोहित से विधि-विधान जान लेना उचित रहता है। समय क्षेत्रानुसार भिन्न हो सकता है।
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